महाकवि श्री पुरूषोत्तम दास निर्मल: एक परिचय
अपने रचना संसार के स्वयं कविर्मनीषी परि भू: स्वयं भू: ब्रह्मा, निरंतर, निर्विराम रचनारत, महाकाव्य की नीव के पत्थर, साहित्य वारिधि, साहित्य जीवी, हिन्दी साहित्य में छ: प्रकाशित, लोकप्रिय एवं पारम्परिक महाकाव्यो के प्रथम प्रणेता, डा0 नगेन्द्र द्वारा संम्पादित 'हिन्दी साहित्य का अधतन
इतिहास में 1975 के बाद के भारत के प्रमुख नौ प्रबन्धकाव्यकारो में से एक, साहित्य गौरव हिन्दी जगत की प्रशंसा के पात्र, सेवानिर्वित प्राचार्य, आकृति से मनोरम, प्रकृति से सहज, सौम्य, संस्कृति से शालीन, सातिवक और उदारचेता, उत्तम शिक्षक, उत्कृष्ट कवि, प्रबन्धक के रूप में उत्कृष्ट कार्यकर्ता,
उत्तम संगीत निर्देशक, एकांकीकार, कहानीकार, निबंधकार, प्रसिद्ध विचारक एवं लेखक, भारत एक्सीलेंस अवार्ड से सम्मानित, समाज सेवी, पर्यावरण के सजग प्रहरी महाकवि श्री पुरूषोत्तम दास निर्मल का जन्म 21 फरवरी 1933 को नारनौल (हरियाणा) में हुआ। इनके पिता का नाम श्री गिरिधर लाल
निर्मल (वैधराज) एवं माता का नाम श्रीमती मिश्री देवी था। इनकी पत्नी का नाम श्रीमती गौमती देवी था। इनके एक पुत्र तथा दो पुत्रियाँ हैं। इन्होने पंजाब यूनिवर्सिटी से एम.ए., बी.टी. तथा प्रभाकर किया और हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग से 'साहित्य रत्न की उपाधि प्राप्त की।
ये हरियाणा विधालय
शिक्षा बोर्ड भिवानी की विषय समिति के सदस्य के रूप में 1976 से 1982 तक लगातार नियुक्त रहे। 1981 से 1988 तक एस.सी.र्इ.आर.टी. गुड़गांव में रिव्यु कमेटी के सदस्य रहे। अपने कार्यकाल के दौरान इन्होने विधालयो में अनेको निर्माण कार्य, वृक्षारोपण, शैक्षिक, सांस्कृतिक एवं शारीरिक विकास
सम्बन्धी कार्यक्रम करवाए। एक समाज सेवी के नाते बाढ़ पीडि़तो, भूकंप पीडि़तो और जरूरतमंदों की सहायतार्थ अनेक नाटको में निर्देशक एवं अभिनेता की भूमिका निभार्इ। होडल (पलवल) में 1972 में 'निर्मल झंकार संकीर्तन मण्डल की स्थापना की एवं धार्मिक समायोजन सम्बन्धी कार्य किये (यह
संस्था आज भी सक्रिय है)। 1961 से 1986 तक श्री आदर्श सनातन धर्म ड्रामेटिक क्लब नारनौल के संगीत निर्देशक के रूप में प्रतिवर्ष निर्वाचित होकर कार्यरत रहे। 1972 से मार्च 2011 तक प्रति मंगलवार और शनिवार को अपने निवास स्थान पर संकीर्तन का आयोजन किया। श्री एस.एस.जैन सभा
नारनौल, आर्य समाज नारनौल तथा रामचरित मानस प्रचार मण्ड़ल नारनौल में धर्म सेवा करने का सुयोग भी इन्हे प्राप्त हुआ। इनकी 72 रचनाएँ All India Radio Rohtak से प्रसारित हुर्इ। अनेक स्थानीय, राज्यस्तरीय, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा ये सम्मानित होते रहे।
साहित्यिक परिचय
(क) प्रकाशित महाकाव्य:-
विधुरा (महाकाव्य) हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत(1985) पृष्ठ संख्या 160
भूमिका : सुप्रसिद्ध कवि स्व0 देवराज'दिनेश, दिल्ली।
महाभारत रत्न (महाकाव्य) हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा प्राप्त अनुदान से प्रकाशित(1992) पृष्ठ संख्या 178
भूमिका: हरियाणा राज्य-कवि डा0 उदयभानु हंस
वेणुगोपाल (महाकाव्य) पृष्ठ संख्या 190 (प्रकाशन वर्ष 1998)
भूमिका: स्व0 डा0 विजयेन्द्र स्नातक, दिल्ली
पदमेश(महाकाव्य) पृष्ठ संख्या 112, प्रकाशन वर्ष 2004
भूमिका: डा0 रामनिवास मानव, हिसार
अरूण पताका(संस्कृत से अनूदित महाकाव्य) प्रकाशन वर्ष 2004, पृष्ठ संख्या 60
प्रभावी शिक्षा: एक प्रयास(गध)पृष्ठ संख्या 100
प्रकाशक: सरस्वती शिक्षा समिति नारनौल, प्रकाषन वर्श 2006
बाल भाषा श्रंखला(दूसरी से पांचवी कक्षा तक) के लिए हिन्दी पाठय पुस्तको का संपादन, एस.सी.र्इ.आर.टी. गुड़गांव के निर्देशन में, सन 1970-1990 तक।
मानस परिक्रमा(हरियाणा की संस्कृति पर आधारित एकल पात्रीय महाकाव्य, प्रकाशन वर्ष 2008 पृष्ठ संख्या 94
समीक्षा: डा0 हरिशचन्द्र वर्मा(सूर पुरस्कार विजेता)
भूमिका: डा0 रामनिवास मानव
ख) अन्य प्रकाशित रचनाएं:-
अमर ज्योति (1971) 2. त्रिवेणी (1980)
3. रामलीला तरंग-4 भाग(1956 से 1989)
4. निर्मल झंकार (तीन संस्करण-1953, 1973, 2010)
5. निर्मल गीतासार (1955)
6. नींव के पत्थर (2010)
(ग) अप्रकाशित पुरस्कृत रचनाएं:-
निबंध - राजकीय शिक्षा संस्थान, करनाल द्वारा प्रथम पुरस्कृत(1971)
तूणीर - (कविता संग्रह) भाषा विभाग, हरियाणा द्वारा प्रथम पुरस्कृत (1975)
निबंध - हरियाणा विज्ञान मंच, रोहतक द्वारा द्वितीय पुरस्कृत (1989)
निबंध - हरियाणा स्कूल शिक्षा बोर्ड, भिवानी द्वारा द्वितीय पुरस्कृत(1990)
(घ) फुटकर रचनाएं (अप्रकाशित किन्तु प्रशंसित):-
कविताएं - 700
मुक्तक - 900
गीत - 700
दोहे - 750
एकांकी संग्रह - पथ के कंटक
निबंध संग्रह - प्रगति के अवरोध एवं आधार
काव्य नाटिका - बजरंग चरित
खण्ड काव्य - प्रवर्तन
कहानियाँ - र्इमानदार लुटेरे, प्यासे पंछी खोजे सरवर
निर्मल साहित्य पर शोध कार्य
| क्रम सं0 | विषय | शोधकर्ता | स्वीकृति प्रदाता विश्वविद्यालय |
| 1. | पी.डी. निर्मल के काव्य में राष्ट्रीय चेतना | श्री महेन्द्र सिंह एम.ए., मोखुता | कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय द्वारा एम.फिल हेतु स्वीकृत |
| 2. | महाभारत रत्न महाकाव्य का समीक्षात्मक अध्ययन | श्री संजीव कुमार जैन, नारनौल | कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय द्वारा एम.फिल हेतु स्वीकृत |
| 3. | वेणु गोपाल महाकाव्य का समीक्षात्मक अध्ययन | श्रीमती मीना कुमारी | कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय द्वारा एम.फिल हेतु स्वीकृत |
| 4. | हरियाणा में रचित महाकाव्य में विधुरा, महाभारत रत्न, वेणुगोपाल महाकाव्यों का विस्तृत उल्लेख | श्री रामनिवास मानव | तिलका मांझी भागलपुर, विश्वविद्यालय द्वारा डी. लिट की उपाधि स्वीकृत |
| 5. | समग्र साहित्य की उत्कृष्टता | हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग | मानद उपाधि 'साहित्य वारिधि' प्रदान की |
| 6. | विश्वस्त सूत्र से प्राप्त समाचारानुसार पी. डी. निर्मल के समग्र साहित्य पर | दो शोधार्थी | म. द.यू. से पी.एच.डी. हेतु शोधरत |
श्रेष्ठ साहित्यकारों की दृष्टि में श्री निर्मल :-
डा0 हरिश्चन्द्र वर्मा ( एम. ए., पी.एच.डी. (संस्कृत), एम. ए. पी.एच.डी., डी. लिट (हिन्दी),
साहित्य रत्न, विद्या वाचस्पति (मानद), सेवा सम्पन्न प्रोफेसर तथा अध्यक्ष, हिन्दी विभाग डीन, भाषा संकाय, महर्षि दयानंद विश्वविधालय रोहतक, प्रथम सूर-पुरस्कार विजेता, सदस्य हिन्दी सलाहकार समिति, उधोग मंत्रालय भारत सरकार) के शब्दों में (मानस परिक्रमा के आकलन में) :-
'' मैं प्रो0 पुरूषोत्तम दास निर्मल के व्यकितत्व और कृतित्व से गत तीन दशकों से प्रभावित होता रहा हू। यथा नाम तथा गुण के अनुरूप वे सचमुच ही 'पुरूषोत्तम दास' भी है और 'निर्मल' भी । वे आकृति से मनोरम, प्रकृति से सहज, सौम्य तथा संस्कृति से शालीन, सातिवक और उदारचेता हैं । उनके व्यकितत्व के इन्ही गुणों ने उनकी रचनाधर्मिता के स्वरूप को निर्धारित किया है । वे निर्मल भावी पुरूषोत्तम दास होने के नाते भारतीय संस्कृति के वैष्णवधर्मी सनातन स्वरूप के प्रति पूर्ण श्रद्धा भाव से समर्पित हैं। उनकी यही वैष्णव आस्था उनके 'वेणु गोपाल' महाकाव्य की 'प्रेरणा और प्रस्तुति' शीर्षक प्रस्तावना में सार रूप में अभिव्यक्त हुर्इ है। वे लिखते हैं, '' भारतीय संस्कृति और धर्म के आधार श्रीराम और श्रीकृष्ण ही हैं । '' इसीलिए उन्होने रामायण के कथानक और कथ्य से प्रेरित होकर अपने प्रथम महाकाव्य विधुरा की रचना की । उनके 'महाभारत रत्न' और 'वेणु गोपाल' शीर्षक महाकाव्य क्रमश: महाभारत और श्रीमद भागवत पुराण पर आधारित हैं । अपने 'पदमेश' नामक चौथे महाकाव्य में उन्होने विष्णु भगवान के दक्षिण भारत में प्रचलित एवं पूजित रूप व्यंकटेश भ गवान को अपनी भावाभिव्यकित का विषय बनाया है। वैष्णवों की उदात्त एवं उदार भकित-भावना, शिव, शकित आदि दिव्य सत्ताओं को भी अपनी रागात्मक परिधि में समेटती रही है। अत: उन्होने शकितस्वरूपा दुर्गा को अनुभूति के केंन्द्र में अवसिथत करके अपने पाँचवें महाकाव्य ' अरूण पताका' की सृषिट की है । जहाँ उपयर्ुक्त पाँच महाकाव्यों में उत्तर और दक्षिण भारत की सामाजिक सांस्कृतिक मानस-यात्रा का निरूपण हुआ है, वहाँ छठे महाकाव्य 'मानस परिक्र मा में हरियाणा प्रदेश की प्राकृतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को आधार बनाकर एक समग्र मानसिक सर्वेक्षण प्रस्तुत किया गया है। उपयर्ुक्त संक्षिप्त विवेचन के आलोक में यह आकलन सर्वथा साधार और युकितसंगत है कि संपूर्ण हरियाणा में सांस्कृतिक और राष्ट्रीय चेतना तथा सनातन जीवन-मूल्यों से आप्लावित छह महाकाव्यों की रचना करने का श्रेय अकेले प्रो0 पुरूषोत्तम दास 'निर्मल' को ही प्राप्त है।
......मैं इसके यशस्वी रचनाकार प्रो0 निर्मल जी को रचनाधर्मिता का ऐसा उज्ज्वल उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए हार्दिकतम बधाइयाँ और शुभकामनाएँ देता हूँ।
प्रेा0 विजयेन्द्र स्नातक के शब्दों में ( वेणु गोपाल की भूमिका में ):-
''.................. वेणु की उस शकित को कवि निर्मल ने अपनी मेधा से पहचाना और गोपाल के साथ वेणु का अटूट संबंध जोड़कर नवीन महाकाव्य का प्रणयन किया है। मैं इस महाकाव्य को पढ़कर कवि निर्मल जी के मिथकीय कथन को नर्इ भूमिका में पाकर प्रमुदित हुआ हूँ........
...............श्री निर्मल ने वेणु गोपाल महाकाव्य की रचना कर एक नर्इ दिशा का पथ प्रशस्त किया है। वे हिन्दी जगत की प्रशंसा के पात्र हैं। ''
श्री रमेश चंद्र शर्मा (पूर्व प्रांतीय महांमंत्री, अखिल भारतीय साहित्य परिषद (पंजी) 289, शिव कालोनी, रेवाड़ी के शब्दों में :-
'' महाकवि निर्मल संगीत-साहित्य-कला में अभिरूचि सम्पन्न एक आदर्शनि ष्ठ शिक्षक रहे हैं। अपने नाम के अनुरूप उनका चिंतन-दर्शन-लेखन-आचरण नितांत निर्मल रहा है, पवित्र गंगा के निर्मल जल की तरह। इसी सुंदर भावना के कारण वे पुरूषोत्तम भी हैं और अपने घट में रचे-बसे प्रभु के विनम्र-विनीत दास भी हैं। आत्मप्रकाशन से बहुत परे उनका अपना एक रचना संसार है जिसके वे स्वयं कविर्मनीषीपरिभू: स्वयं भू: ब्रम्हा है, निरंतर निर्विराम रचनारत।
श्री रमेश चंद्र मिश्र द्वारा 'विधुरा के विषय में :-
'' निशिचत ही यह काव्य राम कथा-काव्य यात्रा में 'साकेत' से आगे एक सक्षम कदम है, ऐसा मेरा विश्वास है।''
डा0 रामदरश मिश्र द्वारा ''विधुरा'' के विषय में
'' प्रकृति के सुंदर और संयत दृश्यों के साथ उभरने वाले मानवीय प्रसंगों और मनोभावों की धारा पाठक को बाँध लेती है और अपनी लपेट में लिये फिरती हैं दार्शनिकता भाव के अन्तर से ही उभरती है, वह
अलग-अलग टुकड़ा बनकर नहीं रह जाती। यह काव्य पाठक को रागात्मक स्पंदनों से भरता हुआ उसे एक वैचारिक भूमि भी प्रदान करता है।''
डा0 देवराज 'दिनेश' के शब्दों में :- ( 'विधुरा' की भूमिका में )
'' साहितियक भीड़-भाड़ से घिरे महानगरों से दूर एक छोटी सी नग री नारनौल में रहते हुए कवि निर्मल ने एकांतवासी योगी की तरह इस महाकाव्य की रचना की है।
कथावस्तु के साथ-साथ कलापक्ष का निर्वाह भी कवि की सशक्त लेखनी ने भली भांति किया है।
काव्य का आनंद तो काव्य पढ़ने सेे ही है, भूमिका पढ़ने से नही।
मुझको पूरा विश्वास है कि यह अकेला महाकाव्य ही हिन्दी के काव्य साहित्य में कवि निर्मल की प्रतिभा के प्रकाश को फैलाएगां भविष्य उनसे बहुत आशाएँ रखता है। ''
डा0 कुंवर बेचैन के शब्दों में:- ( 'नींव के पत्थर' की भूमिका में )
'' यदि हम संक्षेप में 'नींव के पत्थर' संकलन की समीक्षा करे तो काव्यगत विशेषताओं का एक विशाल भंडार समक्ष आता है। इस विशाल भंडार की अथाह सीमा को देखते हुए यह सहज ही लिखा जा सकता है ''हर फूल
यहाँ अति सुंदर है, किसको तोडूं , किसको छोड़ूं। ''
डा0 रामनिवास मानव के शब्दों में :- ( 'पदमेश' की भूमिका में )
'' श्री पुरूषोत्तम दास निर्मल का चौथा महाकाव्य मेरे समक्ष हैं यह कोर्इ अत्युकित नहीं कि पारंपरिक परिपाटी में - निर्धारित महाकाव्य के मानदंडों पर, सुव्यवसिथत प्रबंध योजना के साथ लिखे जाने वाले
महाकाव्यों की कोटि में इतने महाकाव्य लिखने का श्रेय केवल श्री निर्मल को ही जाता हैं प्रबंध काव्य के अंतर्गत खंड काव्य लेखकों की साहित्य क्षेत्र में कमी नहीं है किंतु महाकाव्य लेखन सर्वथा भिन्न विधा है जिसकी
सर्वप्रथम कसौटी किसी पौ राणिक महान व्यकितत्व के समग्र जीवन की गाथा है। सर्वप्रथम मैं श्री निर्मल को इस स्तुत्य प्रयास के लिये साधुवाद देना चाहूँगा ।''
हरियाणा राज्य कवि श्री उदयभानु हंस के शब्दों में :- ('महाभारत रत्न की भूमिका में')
'' साहित्य जीवी श्री पी0 डी0 निर्मल का दूसरा महाकाव्य ' महाभारत रत्न' नवीन युग में शास्त्रीय पद्धति के गिने चुने महाकाव्यों मे से एक है.....................
.............निश्चय ही इस महाकाव्य की रचना करके श्री निर्मल ने बाबू मैथिलीशरण गुप्त एवं श्री दिनकर जी की परंपरा में एक नया आयाम जोड़ दिया है।''
कुछ पंक्तियाँ
चुटकुले एवं अश्लील साहित्य लिखने वाले साहित्यकारों के लिये महाकवि निर्मल का संदेश :-
'' काव्य हँसता है, राष्ट्र रोता है
मार्गदर्शन क्या यही होता है
काव्य दर्पण की तरह हो वरना
लोग कह देंगे कवि सोता है।''
महाकवि निर्मल की मनोव्यथा :-
'' मात मेहनत में कभी खार्इ नहीं
कोर्इ प्रतिभा हमने बिसरार्इ नहीं
जिस तरह सम्मान सरकारी मिले
वह कला अब तक हमें आर्इ नहीं ।''
-:-
'' चुटकुले सुना के कवि मंच के मयंक बनें
सभी को लुभाते और सभी को सुहाते हैं
नग्नता, विलासिता, रोमांस भरे गीत गा के
देश को प्रमाद भरी राह दिखलाते हैं
ऐसे दिलफेंक कवि जनता को लूट -लूट
कोठी कार बंगलों में जिंदगी बिताते हैं
इसीलिये शुद्ध, सत्यनिष्ठ, देशभक्त कवि
और सत्य काव्य सदा ठोकरें ही खाते हैं ।''
अपने साहित्य से अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक ख्याति प्राप्त करने वाले महाकवि पुरूषोत्तम दास निर्मल अपने ही राज् य हरियाणा में उपेक्षित रहे। हरियाणा साहित्य अकादमी प्रतिवर्ष साहित्यकारों को पुरस्कृत एवं सम्मानित करती रही किंतु श्री निर्मल की साहितियक ऊँचाइयों को समझने की कभी जरूरत ही
नही समझी। लेकिन श्री निर्मल एक वैरागी और एकांतवासी योगी की तरह साहित्य रचना में रत रहे। वे अपनी पीड़ा अपनी सशक्त लेखनी से कागजों पर उड़ेलते रहते और उनका मन फिर से वैरागी होकर आदर्श साहित्य रचने लगता ।
महाकवि निर्मल ने अपनी आहलादिनी शकित अपनी धर्मसंगिनी श्रीमती गोमती देवी को मानां इसका सशक्त प्रमाण यह है कि उन्होंने अपने प्रथम महाकाव्य 'विधुरा' पर 'जीवन साथी गोमती के लिये' लिखा। श्री मती गोमती देवी धर्मपरायण, सत्यवती एवं प्रभावशाली महिला थी।....
उन्होने श्री निर्मल के साहित्य सृजन में हर संभव योगदान प्रदान कियां इसी कारण महाकवि ने अपनी हर प्रकाशित रचना में अपनी जीवन संगिनी का बार-बार धन्यवाद किया विधुरा के लेखकीय में श्री निर्मल लिखते हैं -
'' मैं अपनी चिर सहयोगिनी एवं अनुवर्तिनी, धर्मपत्नी श्रीमती गोमती देवी का भी चिरऋणी हूँ जिसका प्रत्यक्ष और परोक्ष सहयोग 'सुख-सुविधा' के रूप में मुझे मिलता रहा और काव्य लेखन में तनिक भी बाधा उत्पन्न नहीं हुर्इ। ''
16 मार्च 2011 से श्री निर्मल का स्वास्थ्य गिरने लगा श्रीमती गोमती देवी उन्हें हँसाने का, उन्हें खुश रखकर उनकी सेवा करने का हर संभव प्रयास करती रही परंतु श्री निर्मल का स्वास्थ्य दिन-प्रतिदिन गिरने लगा। अपने मित्रों में सबसे सुंदर दिखने वाले, चेहरे पर हमेशा मुस्कान रखने वाले, सुगठित
एवं आजीवन स्वस्थ शरीर के धनी श्री निर्मल की कमजोर दशा को वे सहन नहीं कर पार्इ और वैशाख, कृष्ण पक्ष, दशमी 2068 ( दिनांक 27-04-2011) को उन्होने भगवान राम का नाम स्मरण करते हुए प्रात: 4:00 बजे अपने प्राण त्याग दिये। अपनी पत्नी के वियोग को श्री निर्मल सहन नहीं कर
पाए। अपनी पत्नी की पद्रहवीं पर उन्होने 'बरसी' करने को कहा, बरसी का प्रसाद खाया और गहरी निद्रा में चले गए।
अगला दिन ( 13-05-2011) वैशाख के महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी का दिन था। सुबह के 4 बजे से ही महाकवि निर्मल के सुपुत्र ने 'गीता' का पाठ करना आरंभ कर दिया। 'गीता' के अंतिम अध्याय के अंतिम श्लोक को सुनते ही प्रात: 7 बजे महाकवि ने अपनी आँखें खोली, पूरा परिवार ''श्री कृष्ण
गोबिंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवा'' मंत्र का ऊँचे स्वरों में उच्चारण करने लगा। करूणा और क्रंदन के सामूहिक और मिश्रित स्वरों से एक दिव्य आलोक पूरे कमरे में फैल गया और इस दिव्य वातावरण में महाकवि निर्मल ने अपने प्राण त्यागकर प्रेम और भकित की शकित का एक उदाहरण जग वालों के सामने प्रस्तुत कर दिया ।
श्री निर्मल ने कहा भी था-
रूप-रस गंध सब लुटाते हैं।
चमन को स्वर्ग सा बनाते हैं
खुशनुमां जिंदगी का राज बता
फूल चुपके से बिखर जाते है।