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जिसे मिला सान्निध्य तुम्हारा, धन्य हुआ वह मानव मन,
अनुपम काव्य पुष्प शोभामय, सुंदर सहज हुआ उपवन |
शिक्षा, सेवा, काव्य साधना, ध्येय रहा परहित चिंतन,
निर्मल कुल की अमर ज्योति, हे! नतमस्तक हम निर्मल जन |

About Me

अपने रचना संसार के स्वयं कविर्मनीषी परि भूः स्वयं भूः ब्रह्मा, निरंतर, निर्विराम रचनारत, हिन्दी साहित्य में छः प्रकाशित, डा0 नगेन्द्र द्वारा संम्पादित ‘हिन्दी साहित्य का अद्यतन इतिहास’ में 1975 के बाद के भारत के प्रमुख

नौ प्रबन्धकाव्यकारो में से एक, सेवानिर्वित प्राचार्य, उत्कृष्ट कवि, प्रसिद्ध विचारक एवं लेखक, भारत एक्सीलेंस अवार्ड से सम्मानित,

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Books & Poetry

विधुरा (महाकाव्य), महाभारत रत्न (महाकाव्य), वेणुगोपाल (महाकाव्य), पदमेश(महाकाव्य), अरूण पताका(संस्कृत से अनूदित महाकाव्य), प्रभावी शिक्षा: एक प्रयास(गध), मानस परिक्रमा(संस्कृति पर आधारित महाकाव्य),

अमर ज्योति (1971), त्रिवेणी (1980), रामलीला तरंग-4 भाग(1956 से 1989), निर्मल झंकार (तीन संस्करण)

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Awards and Honor

साहित्य कला संगम हिसार द्वारा साहित्य सेवार्थ सम्मानित(1995), साहित्य संस्कृति संगम द्वारा उत्कृष्ट कवि के रूप में सम्मानित (1998),6 जनवरी 2006 को राव इंद्रजीत सिंह

(केन्द्रीय रक्षा राज्य मंत्री) द्वारा पुरस्कृत, 4 जून 2006 को उत्कृष्ट साहित्य सेवी के रूप में मुख्यमंत्री चौधरी भूपेन्द्र सिंह हुडडा द्वारा सम्मानित,26 जनवरी 2006 को जिला प्रशासन द्वारा गणतंत्र

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